:: वीर कुँवर सिंह ::
                                                                          
वीर कुँवर सिंह
वीर कुँवर सिंह का दुर्लभ चित्रघोड़े पर सवार कुँवर सिंह की प्रतिमा अस्सी वर्ष की उम्र में ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले वीर कुँवर सिंह की याद आज की पीढ़ी के लिए धुँधली हो चुकी है। 1857 की क्रांति को कौन भूल सकता है जब एक-एक कर भारतीय रियासत में बगावत की आग भड़क उठी थी।

प्रथम भारतीय स्वतंत्रता सेनानी वीर कुँवर सिंह का जन्म बिहार के तत्कालीन शाहबाद जिला के भोजपुर में जगदीशपुर नामक जगह पर हुआ था। इनके बाबूजी साहबजादा सिंह भारत के राजा भोज के वंशज थे।

1845-46 पटना में ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने वाले षडयंत्र का भंडाफोड़ होने की वजह से वीर कुँवर सिंह अँग्रेजों की हिट लिस्ट में आ गए थे। दानानुर रेजीमेंट, बंगाल के बैरकपुर, रामगढ़ के सिपाही विद्रोह, मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झाँसी, दिल्ली में विद्रोह की आग भड़क उठी थी। दानापुर का तीनों देशी पलटन 25 जुलाई 1857 को वीर कुँवर सिंह के नेतृत्व में आ गए थे। इन्होंने 27 जुलाई को अँग्रेजों के छिपने का ठिकाना आरा पर कब्जा कर लिया था। अँग्रेजों के साथ किसी भी लड़ाई में वीर कुँवर सिंह का हार का सामना नहीं करना पड़ा था। कुँवर सिंह को वहाँ का शासक घोषित कर दिया गया था।

आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कुँवर सिंह ने नोखा, बरांव, रोहतास, सासाराम, रामगढ़, मिर्जापुर, बनारस, अयोध्या, लखनऊ, फैजाबाद, रीवां बांदा, कालपी, गाजीपुर, बांसडीह, सिकंदरपुर, मानियर और बलिया का दौरा किया था और संगठन खड़ा किया था। वीर कुँवर सिंह शिवपुर घाट से गंगा पार कर रहे थे कि डगलस की सेना ने उन्हें घेर लिया। बीच गंगा में उनकी बाँह में गोली लगी थी। गोली का जहर पूरे शरीर में फैल सकता था। इसे देखते हुए वीर कुँवर सिंह ने अपनी तलवार उठाई और अपना एक हाथ गंगा नदी में काटकर फेंक दिया। वहाँ से वह 22 अप्रैल को 2 हजार सैनिकों के साथ जगदीशपुर पहुँचे। अंतिम लड़ाई में भी उनकी जीत हुई लेकिन उसके तीन दिन बाद वीर कुँवर सिंह संसार से हमेशा के लिए विदा हो गए। ऐसे थे हमारे वीर कुँवर सिंह।