:: सेनुआर में सोना बरसता है ::
                                                                          
सेनुआर में सोना बरसता है
सावन में रोहतास जिले के सेनुआर गांव के ऊपर ज्यों ही आसमान काले, नीले, बैंगनी मेघों से ढंका, त्यों ही खेतों में रोपनी, सोहनी छोड़ झुंड के झुंड औरत, मर्द, बच्चे, बूढ़े लोकगीत ‘कजली’ गाते हुए उस टीले की ओर दौड़ पड़े, जिसके बारे में कहा जाता है कि झमाझम पानी बरसते ही वह सोना-चांदी उगलने लगता है। इस बात पर मुहर लगाती है दो चिट्ठियां। एक पत्र रोहतास के कलेक्टर संदीप कुमार आर. पुडकट्टडी ने प्रदेश के कला एवं संस्कृति विभाग को भेजा था, जबकि दूसरी चिट्ठी जिलाधिकारी द्वारा इसकी हकीकत जानने के लिए गठित टीम ने अपनी पड़ताल के पश्चात उन्हें सौंपी थी। संदीप कुमार पुडकट्टडी ने कला-संस्कृति विभाग के सचिव चंचल कुमार को जो पत्र लिखा था, उसका मजमून यह था- ‘सासाराम के सिविल एसडीओ के नेतृत्व में सेनुआर के टीले का निरीक्षण किया गया। वहां गौतम बुद्ध की मूर्तियां मिली हैं। बेशकीमती पत्थर, अष्टधातु की प्रतिमाएं, ऐतिहासिक महत्व की अन्य वस्तुएं लोगों के हाथ लगी हैं। बारिश होने पर सोना भी टीले से निकलता है। वैज्ञानिक ढंग से इसकी खुदाई आवश्यक है। वैसे भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने कभी भी यहां उत्खनन नहीं कराया है।

उपरोक्त चिट्ठी के अलावा सासाराम के अनुमंडलाधिकारी ने अपनी खोजबीन के बाद डीएम को अपना प्रतिवेदन सौंपा था। उसमें जिक्र था- ‘सेनुआर के एक ग्रामीण ने ‘अर्ली फ्रेमिंग कम्युनिटी ऑफ दि कैमूर’ नाम की एक किताब उन्हें दी। इसे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रो. व पुरातत्व वैज्ञानिक आरबी बिष्ट तथा वीरेंद्र प्रताप सिंह ने लिखा है। पुस्तक दो खंडों में एक-एक हजार पृष्ठों की है। दरअसल विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग के एक दल ने १९८६-८७ एवं १९८९-९० में यहां खुदाई की थी। किताब के मुताबिक, एक हजार साल तक लोग यहां बसते रहे हैं। यह काल ई. पू. २२०० से पांचवीं-चौथी शताब्दी तक माना जाता है। यहां प्राप्त हुई मूर्तियां स्थानीय निवासियों के पास सुरक्षित हैं।

कुछ प्रतिमाएं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय स्थित ‘भारत कला भवन’ संग्रहालय में भी हैं। यहां सोना भी बरसात में पाया जाता है। यह रिपोर्ट एसडीओ नलिन कुमार ने ९ जुलाई, २०१३ को जिलाधिकारी को दी थी। दरअसल वर्षा के दौरान ग्रामीणों को सोना मिलने की खबर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक पहुंचाई थी, लिहाजा उन्होंने हकीकत पता करने की जिम्मेदारी कला-संस्कृति विभाग को दे दी। कला-संस्कृति सचिव चंचल कुमार ने रोहतास के जिलाधिकारी से जानकारी मांगी। जिलाधिकारी ने एक टीम बनाई थी, जिसमें अनुमंडलाधिकारी नलिन कुमार, शिवसागर प्रखंड के बीडीओ अरविंद कुमार व सोनहर पंचायत के मुखिया अभय कुमार राय शामिल थे। बहरहाल, सेनुआर बस्ती जाने पर यह उजागर हुआ कि पांच सौ लोगों वाले इस गांव के एक छोर पर बना यह टीला जमीन से तकरीबन पचास-पचपन फुट ऊंचा है। इसी टीले की तलहटी में सेनुआर बसा हुआ है। सेनुआर चारों तरफ से कैमूर पर्वतमाला से घिरा है। यह टीला पकी हुई मिट्टी एवं छोटे-छोटे पत्थरों से बना है। ग्रामीण कभी-कभी जोखिम उठाकर टीले पर चढ़ जाते हैं, इस लालच में कि उनके हाथ सोना-चांदी आ जाएगी, मगर आज तक ऐसा हुआ नहीं है। जब मूसलाधर बारिश होती है, तब स्वत: ऊपर की मिट्टी कटकर नीचे गिरती है और उसी में सोने के आभूषण, स्वर्णकण, मूर्तियां आदि मिलती हैं, लिहाजा जैसे ही आसमान में काले-काले बादल मंडराने लगते हैं, सेनुआर के बाशिंदे सारा काम-काज छोड़कर टीले के नजदीक कूच करते हैं। सेनुआर निवासी सासाराम सिविल कोर्ट के मशहूर अधिवक्ता रामजन्म सिंह बताते हैं- ‘यह कोई नहीं जानता है कि सोना, चांदी, पन्ना सहित अस्त्र-शस्त्र, मूर्तियां गीली मिट्टी में सनी हुई कहां से आती हैं। जो मुकद्दर का सिकंदर रहा, वह यहां से सोना बटोरकर ले गया और रातों-रात धनवान हो गया।

ग्रामीण बताते हैं कि सोनहर के आठ वर्षीय बालक रंजन कुमार ने २०१२ के हथिया नक्षत्र की तेज बारिश के दौरान चार ग्राम सोना एवं दमकते पत्थर की एक माला बटोरी थी। उम्र के अस्सी पड़ाव तय कर चुके जोतदार अवध बिहारी सिंह की किस्मत इस टीले ने बदल दी। उन्हें तीन-चार तोले की सोने की दो अंगूठियां तथा चमकते पत्थरों का एक हार मिला था, जिसके बाद उनकी गिनती अमीरों में होने लगी। इसी प्रकार बेहद गरीब रामकिशन राम को एक भारी छल्ला प्राप्त हुआ था। उस छल्ले पर जो भाषा लिखी हुई थी, वह पढ़ना मुश्किल थी। रामकिशन ने भी उसे बेचकर खासा रु. कमाया। कहते हैं कि २००२ में काश्तकार दिनेश पांडे को एक लोहे की पेटी मिली, जिसमें तीन किलो सोना था। इस सोने को बेचकर दिनेश पांडे ने इलाहाबाद और बनारस में बेशुमार संपत्ति खरीदी। यह भी बताया जाता है कि दो माह पहले स्थानीय निवासी जयराम बिंद को करीब तीन-तीन तोले का एक जोड़ा कंगन मिला था, जबकि बीस दिन पहले एक शख्स को सोने की माला मिली है।

अधिकांश ग्रामीणों ने लोहे की बड़ी-बड़ी छननियां बनवा रखी हैं। पानी बरसते में वे टीले के समीप जाकर मिट्टी को जल समेत छननी में डालते हैं और छने हुए पानी तथा मिट्टी में सोना-चांदी तलाशते हैं, हालांकि अब बारिश शुरू होते ही पुलिस भी वहां पहुंच जाती है। जिलाधिकारी संदीप कुमार पुडकट्टडी ने कहा- ‘यह टीला हमारी धरोहर है। इसकी खुदाई फौरन होनी चाहिए। हमें पता लगा है कि कुछ लोगों को पन्ना सरीखे रत्न तक मिले हैं। निश्चित रूप से यहां हजारों साल पूर्व किसी सभ्यता के तहत राजा-महाराजा की सल्तनत होगी।’ बताते हैं कि कई गांववालों को हरित मणि, सूर्यकांता मणि एवं पन्ने की मालाएं प्राप्त हुई हैं।

बहरहाल, पटना से १८० किलोमीटर दक्षिण में अवस्थित सेनुआर में सोना बरसने की खबर ने हुकूमत को चौकन्ना कर दिया है। खुद सरकार सेनुआर को ‘स्वर्ण ग्राम’ से नवाज रही है।