इस देवी ने तब इंद्र के अहंकार को भी चूर कर दिया था!
                                                                          
इस देवी ने तब इंद्र के अहंकार को भी चूर कर दिया था!
श्रीमद् देवी भागवत और मार्कन्डेय पुराण में भी चर्चा मिलती है रोहतास जिले के उत्तरी छोर पर बियावान में बैठी मां याक्षिणी भवानी की, जिसे कलांतर में कई प्रसंगों के बाद भलुनी भवानी का नाम मिला। आदी गुरु शंकराचार्य ने भी कई बार चर्चा की है इस अष्टभूजी पौराणिक सत्यपीठ की।
ऐसी मान्यता है कि देवासुर संग्राम के बाद अहंकार से भरे इंद्र को यही आकर देवी याक्षिणी ने सत्य का पाठ पढाया था। इसके बाद देवेन्द्र के सारे अहंकार चूर-चूर हो गये। लज्जित होकर इंद्र ने कंचन नदी के किनारे घनघोर तपस्या की, जहां मां याक्षिणी भवानी ने अपना अष्टभुजी रुप इंद्र को दिखलाया। ध्यानमग्न इंद्र को सोने के सिंहासनारुढ़ भगवती के दर्शन हुए, जो सजीव रुप को त्यागकर प्रतिमा के आकार में आ गई।
वहीं पर इंद्र ने मां की स्थापना की तबसे भलूनी धाम में याक्षिणी भवानी विराजमान हुई। इस शक्तिपीठ के प्रधान पुजारी मदन मोहन पांडेय बताते हैं कि घनघोर रात्री में कई बार यहां मां के विचरण करने का आभास हुआ है। कई बार आसपास के इलाके में घटने वाली अशुभ घटनाओं के संकेत भी मिले है। नवरात्र के मौके पर प्रतिवर्ष लगने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ में से कई लोगों ने यह बताया कि यहा मांगे जाने पर एक मनोकामना तो जरूर पूरी होती है। महात्म्य कथा (यक्षणी भवानी) के मुताबिक मंदिर प्रांगण में राम-लक्ष्मण ने रात्रि विश्राम किया था। वैसे बाल्मिकि रामायण और बाद के शाहाबाद गजटीयन भी याक्षिणी भवानी की चर्चा पाई गयी है जो वर्तमान समय में जिला मुख्यालय सासाराम से लगभग 45 किलोमीटर दूर नटवार थाना क्षेत्र के भलूनी धाम में स्थित है।

हजारों की संख्या में मिलते है बंदर
भलुनी धाम में आज से नहीं सैकड़ों वर्ष से बंदरों का बहुत बड़ा जत्था रहता है। सबसे बड़ी बात यह है कि यह बंदर कभी भी धाम के आसपास स्थित घनघोर बागीचे से बाहर नहीं जाते। न ही ग्रामीणों और किसानों को कोई नुकसान ही पहुंचाते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां के बंदरों को भोजन कराने वाले श्रद्धालुओं के उपर याक्षिणी भवानी की खास कृपा-दृष्टि रहती है। यही कारण है कि वहां पहुंचने वाले श्रद्धालू प्रसाद के साथ-साथ भारी मात्रा में अनाज और फल-फूल भी लेकर जाते हैं।