:: अकबर के समय भी था रोहतास सरकार ::
                                                                          
अकबर के समय भी था रोहतास सरकार
रोहतास एक जिले का नहीं एक इतिहास का नाम है, जो बिहार में आर्यो के प्रसार के साथ पड़ा। सूर्यवंशी राजा हरिशचन्द्र के पुत्र रोहिताश्व द्वारा स्थापित 'रोहतास गढ़' के नाम पर इस क्षेत्र का नामकरण रोहतास पड़ा। मुगल बादशाह अकबर के शासन काल 1582 में 'रोहतास सरकार' थी, जिसमें सात परगना शामिल थे। 1784 ई. में तीन परगना को मिलाकर रोहतास जिला बना। इसके बाद यह शाहाबाद का अंग बना और 10 नवम्बर 1972 से रोहतास जिला कायम है।

शाहाबाद गजेटियर के अनुसार रोहतास सरकार में रोहतास, सासाराम, चैनपुर के अलावे जपला, बलौंजा, सिरिस और कुटुम्बा परगना शामिल थे। 1587 ई. में सम्राट अकबर ने राजा मान सिंह को बिहार व बंगाल का संयुक्त सूबेदार बनाकर रोहतास भेजा था। राजा मान सिंह ने उसी वर्ष रोहतास गढ़ को प्रांतीय राजधानी घोषित किया। शाहजहांनामा के अनुसार इखलास खां को 1632-33 में रोहतास का किलेदार नियुक्त किया गया।

अकबरपुर से सटे पहाड़ी के नीचे स्थित एक शिलालेख के अनुसार किलेदार नवाब इखलास खां को मकराइन परगना तथा चांद, सीरिस, कुटुम्बा से बनारस तक फौजदारी प्राप्त थी। वह चैनपुर, मगसर, तिलौथू, अकबरपुर, बेलौंजा, विजयगढ़ व जपला का जागीरदार था। यानी उसके क्षेत्र में पुराना शाहाबाद, गया, पलामू और बनारस क्षेत्र शामिल था। जिसका शासन वह रोहतास से करता था। 25 फरवरी 1702 को वजीर खां के पुत्र अब्दुल कादिर को रोहतास का किलेदार नियुक्त किया गया। उसी समय रोहतास का किला अवांछित तत्वों के काम आने लगा। अकबर के समय से चली आ रही रोहतास सरकार में औरंगजेब ने कई परिवर्तन कर सातों परगना को पुनगर्ठित किया। शाहाबाद गजेटियर में पुन: 1784 में रोहतास जिला स्थापित होने का उल्लेख है। उसके अनुसार रोहतास, सासाराम व चैनपुर परगनों को मिलाकर जिला बनाया गया। रोहतास के सामाजिक एवं सांस्कृतिक इतिहास पर शोध कर चुके आकाशवाणी के पुस्तकालयाध्यक्ष डा. श्याम सुन्दर तिवारी कहते हैं कि यह जिला आदि काल में कारुष प्रदेश था। जिसका वर्णन ब्रह्मांड पुराण में भी आया है। रोहतास गढ़ के नाम पर ही इस क्षेत्र का नामकरण रोहतास होता रहा है। कभी भारत के बादशाह शाहजहां भी इस किले में अपनी बेगम के साथ रहे हैं। मुगल साम्राज्य से पूर्व भी 1494 ई. में दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी ने राजा शालिवाहन को चैनपुर व रोहतास का राज्य सौंपा था।

सर्वप्रथम 1764 ई. में मीर कासिम को बक्सर युद्ध में अंग्रेजों से पराजय के बाद यह क्षेत्र अंग्रेजों के हाथ आ गया। 1774 ई. में अंग्रेज कप्तान थामस गोडार्ड ने रोहतास गढ़ को अपने कब्जे में लिया और उसे तहस-नहस किया। रोहतास का इतिहास, इसकी सभ्यता और संस्कृति अति समृद्धशाली रही है। इसी कारण अंग्रेजों के समय यह क्षेत्र पुरातात्विक महत्व का रहा। 1807 में सर्वेक्षण का दायित्व फ्रांसिस बुकानन को सौंपा गया। वह 30 नवम्बर 1812 को रोहतास आया और कई पुरातात्विक जानकारियां एकत्रित की। 1881-82 में एचबीडब्लू गैरिक ने इस क्षेत्र का पुरातात्विक सर्वेक्षण किया और रोहतास गढ़ से राजा शशांक की मुहर का सांचा प्राप्त किया। वैदिक काल में भी रोहतास का अपना विशिष्ट स्थान रहने का प्रमाण पुराणों में प्राप्त हुए हैं। ब्रह्मांड पुराण-4/29 में इस क्षेत्र को कारुष प्रदेश कहा गया है।- 'काशीत: प्राग्दिग्भागे प्रत्यक शोणनदादपि। जाह्वी विन्ध्योर्मध्ये देश: कारुष: स्मृत:।।' महाभारत काल में कारुष राजा था। महाजनपद युग से लेकर परावर्ती गुप्तकाल तक यह क्षेत्र मगध और काशी के बीच रहा। भगवान बुद्ध उसवेला यानी बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद रोहितवस्तु यानी रोहतास राज्य होते हुए ही ऋषिपत्तन अर्थात सारनाथ गए थे। यह क्षेत्र मौर्यकाल में भी प्रसिद्ध रहा है। तभी तो सम्राट अशोक ने सासाराम के निकट चंदतन शहीद पहाड़ी पर अपना लघु शिलालेख लिखवाया। सातवीं सदी में रोहतास गढ़ का राज्य थानेश्वर का राजा और हर्षवर्द्धन को मार डालने वाले गौड़ाधीप शशांक के हाथों में था। जिसके मुहर व सांचा उत्क्रीर्णन में प्राप्त हुए हैं। 12वीं सदी में भी यह राज्य ख्यारवालों यानी खरवालों (खरवारों) के हाथ में गया। इसी सदी के प्रतापी राजा प्रताप धवल देव के तुतला भवानी, ताराचंडी, रोहतास गढ़ की फुलवारी में स्थित शिलालेख इसके आज भी प्राचीनता की गाथा के मिसाल हैं।